इसी तरह इस विशाल मैदान में ठहरने का उद्देश्य सृष्टि के रहस्यों को समझना है।
सऊदी अरब के पवित्र नगर मक्का के एक स्थान का नाम मशअर है। यह वह स्थान है जहां इंसान अपनी आंतरिक पहचान तक पहुंचता है जबकि मिना महान ईश्वर से प्रेम और उससे मुलाकात का स्थान है। जिस तरह से हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने समस्त बंधनों को अपने दिल से तोड़ लिया और अपने प्राणप्रिय पुत्र हज़रत इस्माईल को महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए कुर्बान करने के लिए ले गये और इस तरह हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने महान ईश्वर से प्रेम और उसके आदेशों के समक्ष नतमस्तक होने का अद्वितीय नमूना पेश किया।
ज़िलहिज्जा, हिजरी क़मरी महीने का एक अच्छा महीना है। यह वह महीना है जिसमें हज के संस्कार अंजाम दिये जाते हैं और हाजी एहराम नामक सफेद वस्त्र धारण करते हैं और पूरी दुनिया के कोने- कोने से वे मक्का जाते हैं। ज़िलहिज्जा मानो महान ईश्वर की ओर वापसी का महीना है। यह वह महीना है जिसमें पाप हज के संस्कार से धुल जाते हैं और हाजियों के प्रायश्चित कबूल होते हैं। ज़िलहिज्जा महान ईश्वर के पावन घर की परिक्रमा का महीना है। ज़िलहिज्जा महान ईश्वर के निमंत्रण पर लब्बैक कहने, आत्म निर्माण और नैतिक परिपूर्णता का महीना है। पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले से आया है कि नेक काम और उपासना किसी भी महीने में ज़िलहिज्जा महीने की 10वीं तारीख़ से अधिक ईश्वर के निकट प्रिय नहीं है। ज़िलहिज्जा महीने की दसवीं तारीख़ से बेहतर व प्रिय महान ईश्वर के निकट कोई दिन नहीं है। जब यह महीना आ जाता था तो पैग़म्बरे इस्लाम और उनके साथी व अनुयाई उपासना को विशेष महत्व देते थे।
आज हाजी महान ईश्वर की बारगाह में कुर्बानी करेंगे ताकि वे कहें कि हम भी हज़रत इब्राहीम की भांति तेरे समक्ष नतमस्तक हैं। अपनी अवैध इच्छाओं और बंधनों से मुक्ति हासिल कर ली है और बंधनों की ज़जीरों को तोड़ दिया है ताकि अधिक से अधिक तुझसे निकट हो सकें।
ईदे कुर्बान के अवसर पर मुसलमान प्रतिवर्ष जश्न मनाते हैं। इस अवसर पर वे गुस्ल करते हैं, अच्छे और नये कपड़े पहनते हैं, इत्र लगाते हैं, ईद की नमाज़ पढ़ते हैं और एक दूसरे से मिलने- मिलाने जाते हैं। इस दिन हाजी की ओर से कुर्बानी कराना अनिर्वाय है और दुनिया के कोने- कोने से लाखों और करोड़ों मुसलमान भी कुर्बानी कराते हैं। वे महान ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने और तक़वा हासिल करने के लिए ऐसा करते हैं। मुसलमान इस दिन भेड़, बकरी और ऊंट आदि की कुर्बानी करते हैं और उसके मांस को निर्धनों में बांटते हैं। इस्लामी रवायतों में बारमबार आया है कि ईदे कुर्बान के दिन कुर्बानी करो ताकि भूखों और असहाय लोगों को भोजन मिले।
ईदे कुर्बान के दिन कुर्बानी कराने और मांस को निर्धनों में बांटने के अलावा कुछ दूसरे कार्य भी मुस्तहब हैं। मुस्तहब ग़ैर अनिवार्य कार्यों को कहते हैं। इनके अंजाम देने पर पुण्य मिलता है परंतु अगर अंजाम न दिया जाये तो कोई पाप नहीं है। इस दिन कुछ नमाज़ें और दूसरे कार्य भी मुस्तहब हैं। यह दिन धार्मिक कार्यों को अंजाम देने का एक अवसर है। एक प्रसिद्ध रहस्यवादी दिवंगत मिर्ज़ा जवाद आक़ा मलेकी तबरीज़ी इस दिन की नेमतों से अधिक से अधिक लाभ उठाने के बारे में कहते हैं" ईद का दिन आरंभ होते ही ध्यान रखो कि वे समस्त कार्य अंजाम दो जो ईश्वर की प्रसन्नता के कारण हैं। ईश्वर अस्तित्व, लोक- परलोक, जीवन और तुम्हारी मृत्यु का मालिक है और ईश्वर की इस प्रकार की कृपा व दया से निश्चेत नहीं रहना चाहिये। ज़िलहिज्जा महीने का दसवां दिन आरंभ होने पर अपने दिल को हर ग़ैर ईश्वर से पवित्र करके गुस्ल करो। उस समय तुमने वास्तव में अल्लाहो अकबर कहा है और यह तकबीर कहकर ईश्वर के मुकाबले में समस्त चीज़ों को छोटी और तुच्छ समझो और अच्छी नीयत के साथ तकवा अर्थात ईश्वरीय भय और शिष्टाचार का वस्त्र धारण करो और उसके बाद ईदगाह की ओर जाओ और ईद की नमाज़ पढ़ो।
ईदुल अज़हा चार बड़ी इस्लामी ईदों में से एक है और ज़िलहिज्जा महीने की दस तारीख़ को यह ईद मनाई जाती है। यह वह ईद है जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हज़रत इस्माईल की कड़ी परीक्षा की याद दिलाती है। यह महान ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होने और समस्त बंधनों से मुक्ति पाने का दिन है। इस दिन सारी दुनिया के मुसलमान जश्न व खुशी मनाते हैं। इस शुभ अवसर पर हम आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई पेश करते हैं। संगीत
ईदे कुरबान एकेश्वरवाद के प्रतिबिंबन का दिन है। यह हाजियों के लिए बहुत बड़ा दिन है। जैसाकि पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने ईदुल अज़हा के दिन को बहुत बड़ा दिन बताते हैं।"
ईद का अर्थ वापसी है। यानी इस दिन इंसान महान ईश्वर की ओर वापसी करता है। इस पवित्र दिन में महान ईश्वर की कृपा और दया की बरसात मोमिन बंदों पर होती है। तो आइये इस दिन में उपासना और प्रार्थना करके हम अपने दिलों को पापों से विशुद्ध बनायें और स्वयं को अधिक से अधिक इस दिन की बरकतों से लाभांवित होने के लिए तैयार करें।
क़ुरबान, क़ुर्ब शब्द से बना है जिसका अर्थ सामिप्य होता है और वह हर उस अच्छे कार्य को कहा जाता है जिसे इंसान महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए अंजाम देता है। हर वह कार्य जो इंसान को महान ईश्वर से निकट करता है उसे एक प्रकार से महान ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए अंजाम दिया जाता है। जैसाकि पैग़म्बरे इस्लाम ने नमाज़ पढ़ने के बारे में फरमाया है" नमाज़ हर सदाचारी को ईश्वर की असीम दया से निकट करने का कारण है"
आज ईदे क़ुरबान और महान ईश्वर से सामिप्य प्राप्त करने का दिन है। लाखों हाजी अरफ़ात के विशाल मैदान में ठहरने और रात भर मशअरुल हराम में जागकर नमाज़ और प्रार्थना के बाद मिना के मैदान में पहुंचे हैं। ज़िलहिज्जा महीने की दसवीं तारीख़ को हज संस्कार नये व निर्णायक चरण में पहुंच जाते हैं और यह वह समय है जहां हाजी एक दूसरे से कांधा से कांधा मिलाकर रमिये जमरात करते हैं यानी शैतान के प्रतीक को कंकरी मारते हैं। हाजी वही कंकरी मारते हैं जो इससे पहली रात को वे एकत्रित किये होते हैं। हाजी अपने इस कार्य से अपने विदित और अंदर के शैतान से दूरी व विरक्तता करते हैं और उसके बाद कुरबानी करने का समय हो जाता है। हाजी, हज का कोई भी संस्कार अंजाम देता है तो उसे एक नया ज्ञान व बोध प्राप्त होता है और हज के समस्त संस्कार में कोई न कोई रहस्य नीहित है। परिज्ञानी व रहस्यवादी कहते हैं कि अरफात के मैदान में ठहरने से इंसान स्वयं और महान ईश्वर के अस्तित्व के बारे में चिंतन- मनन करता है। इसी प्रकार इंसान अरफात के विशाल मैदान में ठहरने से सृष्टि के रहस्यों को समझता है।
ईदुल अज़हा, त्याग, कुर्बानी, निष्ठा और प्रेम की ईद है। अपने प्राणप्रिय बेटे हज़रत इस्माईल को महान ईश्वर की प्रसन्नता के लिए कुर्बान कर देना हज़रत इब्राहीम की कड़ी परीक्षा थी। यह ईद उसी की याद दिलाती है। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने काबे का निर्माण पूरा करने के बाद हज का आदेश दिया और हज संस्कार को कानूनी रूप दिया। 100 साल जीवन व्यतीत करने के बाद वह बूढ़े हो गये थे और इस उम्र में उन्हें अज्ञानी जाति और अत्याचारी शासक नमरूद का सामना हुआ। उसके बाद महान ईश्वर की ओर से उन्हें अपने बेटे हज़रत इस्माईल को ज़िब्ह करने का आदेश मिला। यह उनकी बहुत बड़ी व कठिन परीक्षा थी। महान व सर्वसमर्थ ईश्वर हर इंसान की परीक्षा उसके ईमान के लेहाज़ से लेता है और ईश्वरीय दूतों की परीक्षा कठिन और सख्त होती है।
हज़रत इब्राहीम ने अपने बेटे को ईश्वर की राह में कुरबान करने के लिए सबसे पहले उन्हें ईश्वरीय आदेश से अवगत कराया और कहा मेरे प्रिय बेटे! मैंने सपने में इस प्रकार देखा है कि ईश्वर के समक्ष तुम्हारी बनिचढ़ा रहा हूं तुम अच्छी तरह सोचो फिर जवाब दो। इस पर हज़रत इस्माईल ने कहा कि हे पिता ईश्वर के आदेश पर अमल कीजिये। मुझे आप धैर्य करने वालों में पायेंगे। हज़रत इब्राहीम को एक ओर बेटे का प्रेम सता रहा था और दूसरी ओर से ईश्वरीय प्रेम में डूबे हुए थे पर महान ईश्वर का प्रेम बेटे के प्रेम पर हावी हो गया और वह महान ईश्वर के प्रेम में अपने बेटे को कुर्बानी के लिए मिना के मैदान में ले गये। इस बात से हज़रत इब्राहीम प्रसन्न थे कि महान ईश्वर ने कुर्बानी के लिए उन्हें चुना है। जब बाप- बेटे उस स्थान पर पहुंच गये जहां कुर्बानी करनी थी तो हज़रत इस्माईल ने हज़रत इब्राहीम से कहा पिता जी! मेरे चेहरे को ज़मीन की ओर कर दीजिये कहीं ऐसा न हो कि मेरी आंखों को देखकर आपका दिल कांप जाये और पैतृक प्रेम आपको ईश्वरीय आदेश का पालन करने से रोक दे। हज़रत इस्माईल भी अपने पिता हज़रत इब्राहीम की भांति महान ईश्वर के प्रेम में डूबे हुए थे। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हज़रत इस्माईल को ज़मीन पर लिटाया और उनकी गर्दन पर छुरी चलाई परंतु छुरी ने महान ईश्वर के आदेश से हज़रत इस्माईल का गला नहीं काटा और उसके आदेश से कुर्बानी के लिए एक भेड़ा हज़रत इब्राहीम की नज़रों के सामने आ गया और ग़ैब से आवाज़ आई हे इब्राहीम! तुम इस परीक्षा में सफल हो गये तो ईश्वर की दोस्ती तुम्हें मुबारक हो।